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Sunday, June 19, 2011

बिल्ली की आंखे वाली निहारिका

तीन हजार प्रकाश वर्ष दूर ,एक मरते हुये तारे मे विस्फोट हुआ और गैस के चमकीले बादल तारे से बाहर फेंके गये। हब्बल दूरबीन से लिये गये बिल्ली की आंख के आकार की इस निहारीका(Cat’s Eye Nebula) के चित्र से इस जटिल ग्रहीय निहारीका(planetary nebulae) के बारे मे ज्यादा सुचना मिली है। इस निहारीका का विवरण इतना जटिल है कि विज्ञानीयो को इसके केन्द्र मे स्थित चमकिले पिंड पर युग्म तारे(Binary Star)होने का शक हो रहा है।

ग्रहीय निहारीका छोटी दूरबीन से गोल और एक एक बहुत बडे ग्रह के जैसे दिखायी देती है लेकिन ग्रहीय निहारीका के लिये ग्रह शब्द का प्रयोग गलत है। क्योंकि एक ग्रहीय निहारीका तारो से बनी होती है गैस और धुल जो ढके हुये होते है। यह गैस और धुल इन्ही तारो के द्वारा उतसर्जित होते है।

सी फर्ट आकाशगंगा NGC 7742

नही ये आपके नाश्ते के लिये तैयार किया गया अंडे का आमलेट नही है !

यह एक विशाल आकाशगंगा है जिसका नाम सीफर्ट( Seyfert Galaxy NGC 7742) है। निले रंग के तारो के जन्मस्थली(Star Forming Regions) और धुंधली घुमावदार बांहो से घीरा हुआ पिले रंग का आकाशगंगा केन्द्र लगभग ३००० प्रकाश वर्ष चौडा है। यह पृथ्वी से लगभग ७२० लाख प्रकाशवर्ष दूर भद्रक तारामंडल(constellation Pegasus) मे है। यह एक घुमावदार आकाशगंगा है जिसका केन्द्र काफी चमकदार है, यह चमक कुछ ही दिनो या महिनो मे बदल सकती है। इस तरह की आकाशगंगाओ के केन्द्र मे काफी बडे श्याम विवर (massive black holes) होने की संभावना रहती है। यह चित्र हब्बल दूरबीन से लिया गया है।

मंदाकिनी की बहन ( NGC 3370)

हमारी अपनी आकाशगंगा मंदाकीनी के आकार और प्रकार की आकाशगंगा NGC ३३७० हमसे लगभग १००० लाख प्रकाशवर्ष दूर है। इसे सिंह तारामंडल मे देखा जा सकता है। यह तस्वीर हब्बल दूरबीन से ली गयी है। इस खूबसूरत तस्वीर मे इस आकाशगंगा की घुमावदार सरंचना स्पष्ट रूप से दिखायी दे रही है। तस्वीर के पृष्ठभाग मे और भी कई आकाशगंगाये दिखाई दे रही है। इस आकाशगंगा मे कई पल्सर तारे है जिन्हे सेफिड भी कहते है। इन तारो से हमे इस आकाशगंगा से हमारी दूरी की गणना करने मे मदद मिलती है। इस आकाशगंगा मे कुछ मरते हुये तारे भी है जिनमे से एक है सुपरनोवा Ia। सुपरनोवा के अध्यन से ब्रम्हांड के कई रहस्यो जैसे ब्रम्हांड के विस्तार की गति और परिमाण पर से परदा हटने की संभावना है।

भगवान की अंगुठी

M104 की साधारण प्रकाशीय (Optical) तस्वीर

सोम्ब्रेरो आकाशगंगा एक गोल टोपी या हैट के जैसे क्यो दिखायी देती है ?

इसके कारणो मे है इस आकाशगंगा के मध्य मे आसाधारण रूप से बडा और विस्तारीत तारो का उभार और श्याम धुल की रेखाये जो एक तश्तरीनुमा आकार मे इसके किनारे दिखायी देती है!

इस आकाशगंगा के मध्य मे उपस्थित उभार मे लाखो पुराने तारे है जो इस उभार की चमक को छितराते हैं। इस तस्वीर मे केन्द्रिय उभार को यदि ध्यान से देंखा जाये तो पता चलता है कि अधिकतर प्रकाशबिन्दू गेंद के आकार के तारासमुह(globular clusters) है। इस आकाशगंगा जिसे M104 भी कहते है कि बाहरी धुल से बने वलय मे अनेको नये और चमकदार तारे हैं।
इस आकाशगंगा का केन्द्र विद्युत चुम्बकिय वर्णक्रम (electromagnetic spectrum) के सभी रंग बिखेरता है जिससे यह अनुमान है कि वंहा पर एक महाकाय श्याम विवर हो सकता है।
यह आकाश गंगा हमसे २८० लाख वर्ष दूर है। इसकी चौडाई लगभग ५०,००० प्रकाश वर्ष है। यह कन्या आकाशगंगा समुह मे उपस्थित सबसे बडी आकाशगंगाओ मे से एक है।

M104 की अवरक्त (infrared) तस्वीर

इसे हम एक छोटी दूरबीन से कन्या तारासमुह के पास देख सकते है।

ब्रम्हाण्ड मे एक समुद्री बीच

ब्रम्हाण्डीय बीच(beach) पर रेत के कणो के जैसे फैले हुये तारे! यह तस्वीर है एक स्पायरल के आकार की आकाशगंगा NGC 1313 की। तस्वीर हब्बल दूरबीन से ली गयी है। गैलेलीयो की दूरबीन से लेकर हब्बल दूरबीन तक का यह सफर कितना रोमांचक है ?

आज तकनिक इतनी उन्नत हो गयी है कि हब्बल १४० लाख प्रकाश वर्ष दूर इस आकाशगंगा के तारो के देख पा रहे है। इस आकाशगंगा से हमे तारा समुहो (Star Cluster) के नये चमकीले तारो के अध्यन से ब्रम्हाण्ड के भविष्य के बारे जानकारी प्राप्त होगी। यह आकाश गंगा (NGC 1313)तारो के निर्माण और तारा समुहो के निर्माण के बारे मे जो सुचना देती है उससे हमे अपनी आकाश गंगा मंदाकिनी के बारे ज्यादा जाने मे मदद होगी ।

दो सितारों का मिलन !

ये क्या हो रहा है ? क्या किसी जलधारा मे दो भंवरो का मिलन है ?

ये मिलन ही है लेकिन जमीं पर नही आकाश मे, दो सितारों का नही दो आकाशगंगाओ का!

आज से खरबो वर्ष बाद सिर्फ इनमे से एक ही आकाशगंगा बचेगी। तब तक दोनो पेंचदार(Spiral) आकाशगंगाये NGC 2207 और IC 2163 धीरे धीरे एक दूसरे को खिंचते हुये, पदार्थ की लहरे , गैस की चादर और धूल की गलियां , तारे और बाहर फेंके जाने वाले तारो की धाराओ का निर्माण करेंगी। विज्ञानीयो का अनुमान है कि बडी आकाशगंगा NGC 2207 जो बायें दिखायी दे रही है छोटी आकाशगंगा IC 2163 को अपने मे समाहित कर लेगी।

यह घटना आज से ४०० लाख वर्ष पहले घटना शुरु हुयी थी, इसमे छोटी आकाशगंगा बडी आकाशगंगा के चारो ओर चक्कर लगाते हुये उसमे समाहीत होते जा रही है। इन आकाशगंगाओ के टकराव मे तारो का टकराव सामान्यतः नही होता क्योंकि आकाशगंगा मे तारो के बीच काफी खाली जगह होती है।

चुहो का महायुद्ध

दो महाकाय आकाशगंगाये एक दूसरे को खिंच रही है। इन्हे चुहा इसलिये कहा गया है क्योंकि इनकी लंबी पुंछ है। ये पेंचदार आकाशगंगाये शायद एक दूसरे के पास से गुजर चुकी है। शायद इन दोनो का भविष्य मे फिर से टकराव होगा और ये सीलसीला चलता रहेगा जब तक ये दोनो मिल कर एक आकाशगंगा नही बना लेती। इनकी लम्बी पुंछ का निर्माण दोनो आकाशगंगा के पास और दूर के हिस्सो के बीच सापेक्ष गुरुत्वाकर्षण बल के अंतर के कारण हुआ है।

दोनो आकाशगंगा के मध्य दूरी काफी ज्यादा होने से इनके बीच ब्रम्हांडिय टकराव की प्रक्रिया धीमी गति से हो रही है। यह लगभग पिछले लाखो वर्षो से जारी है। ये आकाश गंगाये NGC 4676 हमसे ३००० प्रकाशवर्ष दूरी पर है,

वलय आकाशगंगा

होग का पिण्ड: एक विचीत्र आकाशगंगा

इस चित्र मे एक आकाशगंगा है या दो ?

अंतरिक्ष विज्ञानीयो के मन मे यह प्रश्न उस समय खडा हुआ जब विज्ञानी आर्ट होग(Art Hoag) ने इस असामान्य पराआकाशगंगीय(extragalactic) पिण्ड का निरिक्षण किया।

इस तस्वीर मे बाहरी छल्लानुमा आकार नये और चमकदार निले तारो से बना है जबकी केन्द्रीय गोलाकार संरचना बुढे पुराने लाल तारो से बनी है। इन दोनो संरचनाओ केन्द्रिय गोले और बाहरी छल्ले के बिच मे एक लगभग श्याम अंतराल है, जो की किसी श्याम निहारीका के पदार्थ से बना हो सकता है।

ये आकाशगंगा कैसे बनी होगी एक यक्ष प्रश्न है क्योंकि बाहरी भाग मे नये तारे और अदंरूनी भाग मे पुराने तारो का तालमेल समझ से बाहर है। अब ऐसी कुछ और आकाशगंगाओ का भी पता चला है जिन्हे अब वलय आकाशगंगा(ring galaxy) कहते है।

जीनेसीस सिद्धांत के अनुसार ऐसी संरचना दो आकाशगंगाओ के टकराव के फलस्वरूप बन सकती है जो कि अरबो वर्षो पुर्व घटीत हुआ होगा। जब एक छोटी आकाशगंगा दूसरी बडी आकाशगंगा के मध्य से गुजरती है, तब गुरुत्वाकर्षण के फलस्वरूप ब्रम्हांडीय धूल और गैस संघनीत होकर ‘तारो के निर्माण की लहरे(Wave of Star Formation)’ बनाते है। इन लहरो से नये बने तारे लहरो के रूप मे केन्द्र से दूर जाते है। ये प्रक्रिया कुछ ऐसे है जब आप किसी तालाब मे एक पत्थर फेंकते है और गोलाकार रूप मे लहरे उठती है।

ध्यान दिजीये कि आकाशगंगाओ के टकराव मे सामान्यतः तारे एक दूसरे से नही टकराते है। ऐसा इसलिये होता है कि आकाशगंगाओ मे तारो के मध्य काफी जगह (कुछ प्रकाशवर्ष)होती है जबकि तारो का व्यास प्रकाशसेकंड के १०० वें भाग से भी काफी कम होता है।

यह तस्वीर जुलाई २००१ मे हब्ब्ल ने ली थी। इसे होग का पिन्ड भी कहते है। यह १००,००० प्रकाशवर्ष चौडी है और हमसे ६००० लाख प्रकाशवर्ष दूर है। इसे आप सर्प नक्षत्र(constellation of Serpens) के पास एक साधारण दूरबीन से देख सकते है।

संयोग से चित्र मे १ बजे की स्थीति मे एक और वलय आकाशगंगा दिखायी दे रही है जो कि इस आकाशगंगा (होग का पिण्ड) से काफी दूर (लाखो प्रकाशवर्ष) है।
एक और वलय आकाशगंगा AM 0644-741 निचे दिये गये चित्र मे दिखायी दे रही है।

वलय आकाशगंगा AM 0644-741

आकाशगंगा समुह एबेल S0740


अदभूत आकाशगंगाओ का यह समुह पृथ्वी से ४५०० लाख प्रकाश वर्ष दूर है। इस आकाशगंगा समुह का नाम एबेल S0740 है। हब्बल द्वारा ली गयी इस तस्वीर के मध्य मे दिर्घवृत्ताकार आकार की आकाशगंगा ESO 325-G004 है। इस चित्र मे आकाशगंगाओ के अलावा कुछ तारे भी बिखरे बिखरे से नजर आ रहे हैं। महाकाय दिर्घवृत्ताकार आकाशगंगा लगभग १००,००० प्रकाश वर्ष चौडी है और इसमे १०० अरब तारे है, लगभग हमारी अपनी आकाशगंगा मंदाकिनी के समान।

सीगार आकाशगंगा(M82)

सीगार के आकार की एम ८२ आकाशगंगा

सीगार के आकार की एम ८२ आकाशगंगा

सीगार आकाशगंगा(M82) किससे प्रकाशमान हो रही है ? एम ८२ एक अनियमित आकार की आकाशगंगा है। हाल ही मे यह विशालकाय पेंचदार आकाशगंगा एम ८१ के पास से गुजरी है जिस कारण से इस आकाशगंगा मे काफी हलचल हुयी है। लेकिन यह हलचल भी लाल रंग मे चमकती हुयी बाहर की ओर विस्तृत होती हुयी गैस के कारण को समझाने मे असमर्थ है। हालिया प्रमाणो के अनुसार यह गैस कई सारे तारो द्वारा उत्सर्जित कणो की वायू से बन रही है और एक आकाशगंगीय आकार की महा-वायू बना रही है। इस चित्र के लाल रंग के हिस्से आयोनाइज्ड हायड़्रोजन गैस के कारण है, जो इस गैस के चमकते हुये तंतुओ को दिखा रहे है। यह लाल रंगे के तंतु १०,००० प्रकाशवर्ष चौड़े है। १२० लाख प्रकाशवर्ष दूर की यह सीगार के आकार की आकाशगंगा अवरक्त(Infrared) किरणो मे सबसे चमकदार आकाशगंगा है। इसे साधारण प्रकाश के रंगो मे छोटी दूरबीन से सप्तऋषि तारामंडल के पास देखा जा सकता है।

एन जी सी ५५८४: हब्बल स्थिरांक की गणना

एन जी सी ५५८४

एन जी सी ५५८४

खूबसूरत आकाशगंगा एन जी सी ५५८४ यह ५०,००० प्रकाशवर्ष चौडी़ है और पृथ्वी से ७२० करोड़ प्रकाशवर्ष दूर कन्या नक्षत्र मे स्थित है। इस महाकाय आकाशगंगा की पेंचदार बांहो मे ढेर सारे नये नवजवान तारे तथा धूल से भरी गलीयां है। यह आकाशगंगा पृथ्वी की ओर से स्पष्ट दिखायी देने वाली एक और खूबसूरत आकाशगंगा ही नही है। इसमे लगभग २५० सेफीड चर तारे(Cepheid Variable Star) है तथा हाल ही मे इसमे एक Ia प्रकार(Type Ia) का सुपरनोवा विस्फोट हुआ है।

सेफीड तारे अपने स्थायी एक समान चमक तथा स्थायी प्रकाश स्पंदन(Light Pulse) के लीये जाने जाते है, इस विशेष गुणधर्म से उन्हे ब्रह्मांड मे दूरीयों की गणनाओ के लिए मानक ज्योति (Standard Candle) के रूप मे उपयोग किया जाता है।

एन जी सी ५५८४ हब्बल स्थिरांक की नयी गणना के लिये चूनी गयी आठ आकाशगंगाओ मे से एक है। इस गणना के लिए आवश्यक निरिक्षण हब्बल दूरबीन द्वारा किया जा रहा है। इस गणना का परिणाम श्याम ऊर्जा(Dark Energy) द्वारा ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति मे त्वरण(accleration) पर नयी रोशनी डालेगा।

इस चित्र मे दिखायी दे रहे लाल धब्बेनुमा बिंदू पृष्ठभूमि स्थित दूरस्थ आकाशगंगाएँ है।

हब्बल दूरबीन के २१ वर्ष : आर्प २७३ आकाशगंगा

आर्प २७३ : एक दूसरे से टकराती युजीसी १८१० तथा युजीसी १८१३ आकाशगंगाएँ

आर्प २७३ : एक दूसरे से टकराती युजीसी १८१० तथा युजीसी १८१३ आकाशगंगाएँ

२४ अप्रैल १९०० को डीस्कवरी स्पेश शटल ने हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला को पृथ्वी की कक्षा तथा इतिहास मे स्थापित किया था। हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला की वर्षगांठ पर पेश है हब्बल द्वारा लिया गया आर्प २७३ आकाशगंगाओ का यह खूबसूरत चित्र !

वर्षो पहले खगोलविज्ञानी हाल्टन आर्प ने विचित्र आकार की कई आकाशगंगाओं का निरीक्षण कर सूचीबद्ध किया था। अब हम जानते है कि ये आकाशगंगाये एक दूसरे पर गुरुत्वाकर्षण बल का प्रभाव डाल रही है और कुछ आकाशगंगाये टकरा रही है। इस चित्र मे दो आकाशगंगाये है युजीसी १८१०(उपर) तथा युजीसी १८१३(निचे)। ये दोनो आकाशगंगाये एक दूसरे से टकरा रही है जिन्हे संयुंक्त रूप से आर्प २७३ कहा जाता है।

अधिकतर पेंचदार आकाशगंगाये सममिती मे और लगभग वृत्ताकार होती है लेकिन युजीसी १८१० अलग है और विचित्र भी। इसकी एक बांह मोटी है और अन्य बांहो की तुलना मे दूर है। जिससे एस आकाशगंगा का केन्द्रक आकाशगंगा के ज्यामितिय केन्द्र के पास नही है। इस आकाशगंगा के उपर स्थित निले क्षेत्र नये तारो की जन्मस्थली है और तिव्रता से तारो का निर्माण कर रहे है। ये नवतारे गर्म, महाकाय निले तारे है जिनका जीवनकाल कम होता है। युजीसी १८१३ का आकार भी विकृत हो चूका है, इसकी बांहो मे एक मरोड़ है और गैस का प्रवाह चारो ओर हो रहा हओ।

कुछ करोड़ वर्ष पहले ये आकाशगंगाये एक दूसरे के समीप आ गयी होंगी। इनके गुरुत्वाकर्षण ने एक दूसरे को विकृत कर दिया है, जिससे इनकी बांहे फैल गयी है। इन आकाशगंगाओं की गैस एक दूसरे मे मिल रही है। इन आकाशगंगाओं के केन्द्रक भी असामान्य है, छोटी आकाशगंगा का केन्द्र अवरक्त किरणो मे ज्यादा चमकदार है जो दर्शाता है कि इस क्षेत्र मे तारो का निर्माण धूल के बादलो के पिछे दब गया है। बड़ी आकाशगंगा के केन्द्र मे एक श्याम वीवर(Black Hole) है जिसके चारो ओर गैस प्रवाहित हो रही है जो गर्म होकर प्रकाश उत्सर्जित कर रही है।

दोनो आकाशगंगा विकृत हो चुकी है लेकिन उनका पेंचदार तश्तरी नुमा आकार अभी तक है जिससे यह प्रतित होता है कि ये अपने ब्रह्मांडीय नृत्य के प्रथम चरण मे है। एक दोनो भविष्य मे एक दूसरे का चक्कर लगाते हुये , एक दूसरे के पास आते जायेंगे। कुछ करोड़ो वर्ष बाद ये दोनो मिलकर एक बड़ी आकाशगंगा बनायेंगे। ब्रह्माण्ड मे यह एक सामान्य प्रक्रिया है। हमारी अपनी आकाशगंगा मंदाकिनी ऐसे ही आकाशगंगाओ के मिलने से बनी है। भविष्य मे हमारी आकाशगंगा पड़ोस की आकाशगंगा एन्ड्रोमीडा से टकराएगी और एक महाकाय आकाशगंगा बनाएगी लेकिन कुछ अरबो वर्ष बाद !

इन दोनो आकाशगंगाओ का जो भी भविष्य हो, हम ३००० लाख प्रकाशवर्ष दूर इन खूबसूरत आकाशगंगाओ को देख रहे है। हमे इसके लिए हब्बल वेधशाला का आभारी होना चाहिये। हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला ने पिछले २१ वर्षो मे विज्ञान को महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसमे अंतरिक्ष विज्ञान को जन सामान्य मे लोकप्रिय बनाना भी शामिल है। आज पूरे विश्व मे यह एक ऐसी वेधशाला है जिसे लोग उसके नाम से जानते है।

धूल के बादलो से रेखांकित आकाशगंगा एन जी सी ७०४९

धूल के बादलों से रेखांकित आकाशगंगा एन जी सी ७०४९

धूल के बादलों से रेखांकित आकाशगंगा एन जी सी ७०४९

इस असामान्य आकाशगंगा का निर्माण कैसे हुआ होगा? यह कोई नही जानता है क्योंकि यह पेंचदार(Spiral) आकाशगंगा एन जी सी ७०४९ है ही इतनी विचित्र! एन जी सी ७०४९ मे सबसे विचित्र एक धूल और गैस का वलय है हो इस आकाशगंगा के बाह्य रूपरेखा मे दिख रहा है। यह धूल का वलय जैसे इस आकाशगंगा के छायाचित्र मे बाह्य सीमाओ को रेखांकित कर रहा हो!

यह अपारदर्शी वलय इतना गहरा है कि यह अपने पिछे लाखों तारो को ढंक दे रहा है। यदि इस गहरे वलय को छोड़ दे तो यह आकाशगंगा एक दीर्घवृताकार(Elliptical) आकाशगंगा है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से इसमे कुछ तारो के गोलाकार समूह(Globular Cluster) भी है। उपर दिया गया चित्र हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला से लिया गया है।

इस चित्र के उपर मे चमकता तारा हमारी आकाशगंगा (मंदाकिनी) का है जो इस आकाशगंगा से संबधित नही है। एन जी सी ७०४९ आकाशगंगा मे अपने समूह की आकाशगंगाओं मे सबसे चमकदार है, जो यह दर्शाती है कि यह आकाशगंगा बहुत सी आकाशगंगाओ के टकराव और एकीकरण से बनी है।

यह आकाशगंगा १५० हजार प्रकाशवर्ष चौड़ी तथा पृथ्वी से १००० लाख प्रकाशवर्ष दूर है।

बुढापे की ओर बढ़ती हुयी मंदाकिनी

मंदाकिनी आकाशगंगा

मंदाकिनी आकाशगंगा

यह हमारी अपनी आकाशगंगा मंदाकिनी है जो लगभग 100 हजार प्रकाशवर्ष चौड़ी है।

हमारी मन्दाकिनी आकाशगंगा उम्र के ऐसे दौर से गुजर रही है, जिसके बाद अगले कुछ अरब वर्षों में इसके सितारों के बनने की गति धीमी पड़ जाएगी। ग्रहों पर नजर रखने वाले वैज्ञानिको का कहना है कि आकाशगंगा को आमतौर पर दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। ऊर्जा से भरपूर नीली आकाशगंगा जो तेज रफ्तार से नए सितारों को गढ़ती रहती हैं और सुस्त लाल आकाशगंगा जो धीरे-धीरे मौत की ओर बढ़ रही होती हैं।

स्विनबर्ग टेक्नॉलजी यूनिवर्सिटी की एक टीम ने यह दिखाया है कि हमारी मन्दाकिनी आकाशगंगा इनमें से किसी भी श्रेणी के तहत नहीं आती। यह एक ‘हरित घाटी(Green Vally)‘ जैसी आकाशगंगा है, जो किशोर नीली आकाशगंगा और बूढ़ी लाल आकाशगंगा के बीच की स्थिति में है।

ऐस्ट्रोफिजिकल जर्नल के एक शोध पत्र के अनुसार, ऐसा पहली बार है, जब वैज्ञानिकों ने ब्रह्माण्ड की बाकी आकाशगंगाओं के साथ हमारी आकाशगंगा के रंग और सितारों के बनने की दर की तुलना की है। टीम को हेड करने वाले डॉ. डेरन क्रोटोन ने कहा कि अपनी आकाशगंगा की स्थिति का उस समय आकलन करना काफी कठिन होता है, जब हम खुद इसके भीतर मौजूद हों।

इस समस्या का हल करने के लिए वैज्ञानिकों ने आकाशगंगा के पिछले 20 साल के दौरान लिए गए आंकड़ों का अध्ययन किया और इसे आकाशगंगा की मौजूदा स्थिति की एक व्यापक तस्वीर में फिट करने के लिए जमा किया। डॉक्टर क्रोटोन ने कहा कि ब्रह्माण्ड के तमाम रंगों को वर्गीकरण करने के दौरान हमने जिन गुणों को देखा है, उनके आधार पर हम यह कह सकते हैं कि विकासक्रम में हमारी आकाशगंगा नीली और लाल के मध्य की अवस्था में है। इसका मतलब है कि इसमें तारे बनने की प्रक्रिया अगले कुछ अरब वर्षों में धीमी पड़ जाएगी।

सितारो का जन्म

निहारीका (Nebula) एक ब्रम्हाण्डीय नर्सरी होती है जहाँ तारों का जन्म होता है। यह एक धूल और गैसों का बादल होता है । सभी तारों का जन्म निहारिका से होता है सिर्फ कुछ दुर्लभ अवसरो को छोड़कर जिसमे दो न्यूट्रॉन तारे एक श्याम विवर बनाते है। वैसे भी न्यूट्रॉन तारे और श्याम विवर को मृत तारे माना जाता है।

निहारिका दो अलग अलग कारणों से बनती है। एक तो ब्रह्माण्ड की उतपत्ती से ही है। ब्रह्माण्ड के जन्म के बाद ब्रह्माण्ड मे परमाणुओं का निर्माण हुआ और इन परमाणुओं से धूल और गैस के बादलों का निर्माण हुआ। इसका मतलब यह है कि गैस और धूल जो इस तरह से बनी है उसका निर्माण तारे से नही हुआ है बल्कि यह ब्रह्माण्ड के निर्माण के साथ निर्मित मूल पदार्थ है।

निहारिका के निर्माण का दूसरा तरीका किसी विस्फोटीत तारे से बने सुपरनोवा से है। इस दौरान सुपरनोवा से जो पदार्थ उत्सर्जित होता है उससे भी निहारिका बनती है। इस दूसरे तरीके से बनी निहारिका का उदाहरण वेल(Veil) और कर्क (Crab) निहारिकाये है। ध्यान रखे कि निहारिकाओ का निर्माण इन दोनो तरीकों के मिश्रण से भी हो सकता है।

निहारिकाओ के प्रकार

उत्सर्जन निहारिका (Emission): इस तरह की निहारिकाये सबसे सुंदर और रंग बिरंगी होती है। ये नये बन रहे तारों से प्रकाशित होती है। विभिन्न तरह के रंग भिन्न तरह की गैसों और धूल की संरचना के कारण पैदा होते है। सामान्यतः एक बड़ी दूरबीन (8+ इंच) से उत्सर्जन निहारीका के लगभग सभी रंग देखे जा सकते है। तस्वीर मे सभी रंगो को देखने के लिये लम्बे-एक्स्पोजर से तस्वीर लेनी पढ़ती है।

चील निहारिका(M16) और झील निहारिका (Lagoon या M8) इस तरह की निहारिका के उदाहरण है। M16 मे तीन अलग अलग गैसों के स्तंभ देखे जा सकते है। यह तस्वीर हब्बल से ली गयी है और इसे साधारण दूरबीन से इतना स्पष्ट नही देखा जा सकता। इस स्तंभो के अंदर नये बने तारे है, जिनसे बहने वाली सौर वायु आसपास की गैस और धूल को दूर बहा रही है। इसमे सबसे बड़ा स्तंभ १० प्रकाश वर्ष उंचा और १ प्रकाश वर्ष चौड़ा है। इसकी खोज १७६४ मे हुयी थी और यह हमसे ७००० प्रकाश वर्ष दूर है।
चील निहारिका

चील निहारिका

निचले दी गयी M 8 की तस्वीर भी हब्बल दूरबीन से ली गयी है। यह ५२०० प्रकाश वर्ष दूर है। इसकी खोज १७४७ मे हुयी थी। इसका आकार १४०X६० प्रकाश वर्ष है।

M8 निहारिका

परावर्तन निहारिका (Reflection): यह वह निहारीकाये है जो तारों के प्रकाश को परावर्तित करती है, ये तारे या तो निहारिका के अंदर होते है या पास मे होते है। प्लेइडेस निहारिका इसका एक उदाहरण है। इसके तारों का निर्माण लगभग १००० लाख वर्ष पूर्व हुआ होगा। हमारे सूर्य का निर्माण ५०,००० लाख वर्ष पूर्व हुआ था। ये सितारे धीरे धीरे निहारिकाओ से बाहर आ रहे है।

NGC 1333 – परावर्तन निहारीका

श्याम निहारिका (Dark): ऐसे तो सभी निहारिकाये श्याम होती है क्योंकि ये प्रकाश उत्पन्न नही करती है। लेकिन विज्ञानी उन निहारिकाओ को श्याम कहते है जो अपने पीछे से आने वाले प्रकाश को एक दीवार की तरह रोक देती है। यही एक कारण है कि हम अपनी आकाशगंगा से बहुत दूर तक नही देख सकते है।

आकाशगंगा मे बहुत सारी श्याम निहारीकाये है, इसलिये विज्ञानियों को प्रकाश के अन्य माध्यमों का(x किरण, CMB) सहारा लेना होता है।
निचले चित्र मे प्रसिद्ध घोड़े के सर के जैसी निहारिका दिखायी दे रही है। यह निहारिका एक अन्य उत्सर्जन निहारिका IC434 के सामने स्थित है।

घोडे के सर जैसी निहारिका

ग्रहीय निहारिका (Planetary): इन निहारिकाओ का निर्माण उस वक्त होता है जब एक सामान्य तारा एक लाल दानव (red gaint)तारे मे बदल कर अपने बाहरी तहों को उत्सर्जित कर देता है। इस वजह से इनका आकार गोल होता है। चित्र मे बिल्ली की आंखो जैसी निहारिका(Cat’s Eye NGC 6543) दिखायी दे रही है। इस तस्वीर मे तारे के बचे हुये अवशेष भी दिखायी दे रहे है।

बिल्ली की आंखो वाली निहारिका

दूसरी तस्वीर नयनपटल निहारिका(Retina IC 4406) मे वृताकार चक्र उसके बाजु मे दिखायी दे रहा है। तारे का घूर्णन और चुम्बकिय क्षेत्र इसे वृताकार बना रहा है ना कि एक गोलाकार।
ग्रहीय यह शब्द निहारिकाओ के लिये सही नही है। यह शब्द उस समय से उपयोग मे आ रहा है जब युरेनस और नेप्च्यून की खोज जारी थी। उस समय हमारी आकाशगंगा के बाहर किसी और आकाशगंगा के अस्तित्व की भी जानकारी नही थी।

नयनपटल निहारिका

सुपरनोवा अवशेष: ये निहारिकाये सुपरनोवा विस्फोट के बाद बचे हुये अवशेष है। सुपरनोवा किसी विशाल तारे की मृत्यु के समय उनमें होने वाले भयानक विस्फोट की स्थिति को कहते है। कर्क (Crab) निहारीका इसका एक उदाहरण है।

कर्क निहारिका

सितारों के जन्म की प्रक्रिया

सितारों के जन्म के पहली स्थिति है , इंतजार और एक लम्बा इंतजार। धूल और गैस के बादल उस समय तक इंतजार करते है जब तक कोई दूसरा तारा या भारी पिंड इसमे कुछ हलचल ना पैदा कर दे! यह इंतजार हजारों लाखों वर्ष का हो सकता है।

जब कोई भारी पिंड निहारीका के पास से गुजरता है वह अपने गुरुत्वाकर्षण से इसमे लहरे और तरंगे उत्पन्न करता है। कुछ उसी तरह से जैसे किसी प्लास्टिक की बड़ी सी चादर पर कुछ कंचे बिखेर देने के बाद चादर मे एक किनारे पर से या बीच से एक भारी गेंद को लुढका दिया जाये। सारे कंचे भारी गेंद के पथ की ओर जमा होना शुरु हो जायेंगे। धीरे धीरे ये सारे कंचे चादर मे एक जगह जमा हो जाते है।

ठीक इसी तरह निहारिका मे धूल और गैस के कण एक जगह पर संघनित होना शुरु हो जाते है। पदार्थ का यह ढेर उस समय तक जमा होना जारी रहता है जब तक वह एक महाकाय आकार नही ले लेता।

इस स्थिति को पुर्वतारा( protostar) कहते है। जैसे जैसे यह पुर्वतारा बड़ा होता है गुरुत्वाकर्षण इसे छोटा और छोटा करने की कोशिश करता है, जिससे दबाव बढते जाता है, पुर्वतारा गर्म होने लगता है। जैसे साईकिल के ट्युब मे जैसे ज्यादा हवा भरी जाती है ट्युब गर्म होने लगता है।

जैसे ही अत्यधिक दबाव से तापमान १०,०००,००० केल्विन तक पहुंचता है नाभिकिय संलयन(Hydrogen Fusion) की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है। अब पुर्वतारा एक तारे मे बदल जाता है। वह अपने प्रकाश से प्रकाशित होना शुरू कर देता है। सौर हवाये बचे हुये धूल और गैस को सुदूर अंतरिक्ष मे धकेल देती है।

न्युट्रान तारे और पल्सर

न्युट्रान तारे ये मृत तारे का अत्यंत सघन रूप है, जो कि सिर्फ न्युट्रान से बने होते है। न्युट्रान तारो का एक उपवर्ग पल्सर भी है। इन्हे पल्सर इसलिये कहा जाता है क्योंकि ये विद्युत चुंबकिय विकीरण(Electro Magnetic radiation) की पल्स उत्सर्जीत करते रहते है।

न्युट्रान तारा
नाम के अनुसार ये तारे न्युट्रान से बने होते है। ये उन तारो के अवशेष होते है जिनका द्र्व्यमान १.४ से ९ सौर द्रव्यमान के बीच होता है। तारे के नोवा बनने के बाद उसका केन्द्रक सिकुड जाता है और उसकी बाहरी तहे अंतरिक्ष मे विस्फोट द्वारा उतसर्जीत होकर निहारीका (Nebula)बनाती है। गुरुत्वाकर्षण केन्द्रक को और सिकुडने और सघन होने पर मजबूर करता है। यह केन्द्रक कुछ सेकण्डो मे कुछ किमी(२५ किमी) के गोले मे बदल जाता है। ये इतना सघन होता है कि एक सूई की नोक के बराबर के पदार्थ का द्रव्यमान हजारो टन मे होगा।

न्युट्रान तारा

पृथ्वी के साधारण वातावरण मे यह घटना असंभव है। एक परमाणु मे काफी इलेक्ट्रान और नाभिक के बिच काफी सारी खाली जगह होती है जो कि चार मूलभूत बलो मे से एक विद्युत चुम्बकिय बल के कारण होती है। ये बल इलेक्ट्रान को नाभिक से दूर रखता है। जब यह विद्युत चुम्बकिय बल कार्यशील होता है, तारा सिकुडकर न्युट्रान तारे के आकार मे नही आ सकता। लेकिन तारे का द्र्व्यमान बहुत ज्यादा होने पर गुरुत्वाकर्षण(मूलभूत बलो मे से एक) विद्युत चुम्बकिय बल से ज्यादा प्रभावी हो जाता है। इन्ही कुछ क्षणो मे विद्युत चुम्बकिय बल टूट जाता है और गुरुत्वाकर्षण के दबाव मे इलेक्ट्रान प्रोटान से मिलकर न्युट्रान बना देते है। और जो भी कुछ बचता है वह सिर्फ न्युट्रान तथा एक अत्यंत सघन न्युट्रान तारा जन्म लेता है।

सुपरनोवा के अवशेष और न्युट्रान तारा

न्युट्रान तारा की रचना काफी आसान होती है। इसकी तीन तहे होती है। एक ठोस केन्द्रक, एक तरल आवरण और एक पतली बाहरी परत। न्युट्रान तारो का एक बहुत पतला कुछ सेंटीमीटर (१ इंच) का वातावरण भी होता है जो कि तारे के कार्य के लिये महत्वपूर्ण नही होता है। न्युट्रान तारे के भी दो अक्ष होते है। चुम्बकिय अक्ष और घुर्णन अक्ष। पृथ्वी की तरह ये दोनो अक्ष भी एक साथ नही होते है।

पल्सर

ये भी न्युट्रान तारे होते है लेकिन एक विशेषता के साथ। पल्सर अंतरिक्ष मे दो अत्याधिक उर्जा वाली तरंगे उत्सर्जित करता है जो कि उसकी चुंबकिय अक्ष के पास सघन होती है। यह चुंबकिय बल पृथ्वी के चुंबकिय बल से १० खरब गूना ज्यादा शक्तिशाली होता है। ये तरंगे सामान्यतः किसी साथी तारे से प्राप्त किये पदार्थ की होती है, जिसमे कणो की गति को प्रकाश की गति के २०% तक त्वरीत कर दिया गया होता है।

एक कलाकार की कल्पना मे पल्सर

पल्सर निरिक्षणो के अनुसर काफी तेज घुर्णन करते है, अधिकतर एक सेकंड मे एक घुर्णन करते है। सबसे तेज पल्सर एक सेकंड मे ६४२ घुर्णन करता है और सबसे धीमा ४.३०८ सेकंड मे एक। यह तेजी कोणीक गति के संरक्षण(Law of conservation of angular momentum) के नियम के अतर्गत होती है। इस नियम के अनुसार यदि कोई पिण्ड एक गति से घुर्णन कर रहा है और उस पिण्ड का आकार कम हो जाता है लेकिन द्रव्यमान अपरिवर्तित रहता है तब उसकी घुर्णन गति बढ जाती है। इसका उदाहरण स्केटर है, वे स्केटींग करते हुये घुर्णन करते समय घुर्णन गति बढाने के लिये अपने हाथ सिकोड कर शरीर के पास ले आते है जबकि घुर्णन गति कम करने के लिये हाथ सिधे कर लेते है।

पल्सर भी धीमे पडते जाते है और रूक जाते है क्योंकि ये अपनी उर्जा तरंग के रूप मे अंतरिक्ष मे भेजते है जिसे गुरुत्विय तरंग कहते है। यह गुरुत्विय तरंग सभी गतिज महाकाय पिंड से उत्सर्जित होती है और इसकी गति प्रकाशगति के तुल्य होती है। घुर्णन से रूकने के बाद की स्थिती मे पल्सर एक साधारण न्युट्रान तारा बन जाता है।

कुछ दूर्लभ मौको पर दो न्युट्रान तारे एक युग्म तारे के रूप मे बंध जाते है। उर्जा के ह्रास के कारण ये स्पायरल के जैसे एक दूसरे की परिक्रमा करते हुये पास आते जाते है। अंत मे दोनो मिल जाते है, इस स्थिती मे वे दोनो मिलकर एक श्याम विवर को जन्म देते है।

लाखों तारे आसमां मे

सामान्यत: तारे अकेले ना होकर एक समुह(Cluster) मे रहते है। तारासमुह दो तरह के होते है खुले हुये और गोलाकार ।

खुले हुये तारासमुह
ये कभी कभी आकाशगंगीय तारा समुह भी कहलाते है क्योंकि ये तारासमुह तुलनात्मक दृष्टी से हमारे करीब तो है ही और वे हमारी आकाशगंगा मंदाकीनी मे हमारे प्रतल मे ही है। खुले तारासमुहो मे कुछ दर्जन तारो से लेकर कुछ सौ तारे हो सकते है। ये माना जाता है कि ये सभी तारे एक ही निहारिका से निर्मित है और समान सापेक्ष गति रखते है। इसी वजह से एक समुह के तारे विभीन्न दिशाओ मे गति करते हुये तारासमुह को छितराते जाते है। ये तारासमुह नष्ट भी हो सकते है लेकिन ऐसा तभी हो सकता है जब कोई महाकाय तारा तारासमुह के पास से गुजरे और अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति से विभीन्न तारो की गति को प्रभावित कर दे।

कुछ तारा समुह मे कुछ तारे बाकी तारो की बजाय ज्यादा प्रकट होते है, ये उस तारे की चमक या स्थिती से भी हो सकता है। चित्र मे दिखाया गया तारासमुह “कृतिका नक्षत्र” है जिसे पश्चिम मे “सात बहने Seven Sisters” या Pleiades कहते है। यह तारा समुह प्रागऐतिहासिक समय(७०० -१००० BC) से ज्ञात है। इसे वैज्ञानिक शब्दावली मे M45 कहते है, यह लगभग ४४० प्रकाशवर्ष दूर है। इस तारासमुह के ७ तारे नंगी आंखो से दिखायी देते है लेकिन दूरबीन से इसके १४ तारे देखे जा सकते है। लेकिन ये इस तारासमुह के सबसे ज्यादा चमकिले तारे है, असलियत मे इस तारासमुह मे ५०० से ज्यादा तारे है।
एक नये खुले तारासमुह मे तारो के बीच मे अपने मातृ निहारिका का बचा हुआ पदार्थ होता है। जो धीरे धीरे तारो के विकीरण , गुरुत्व के कारण नष्ट हो जाता है। लेकिन कृतिका के मामले मे ऐसा नही है, इस तारा समुह के बीच मे जो पदार्थ दिखायी देता है वह किसी और निहारीका है।

कृतिका(M40/Pleiades/Seven Sisters) तारासमुह

गोलाकार तारासमुह(Globular Star Cluster)
ये तारासमुह खुले तारासमुह से काफी अलग होते है। हमारी आकाशगंगा मंदाकिनी के केन्द्र मे इस तरह का एक भी तारासमुह नही है, सभी गोलाकार तारासमुह हमारी आकाशगंगा के बाहरी हिस्से मे ही है। मंदाकिनी मे १५० ज्ञात गोलाकार तारासमुह है। अन्य आकाशगंगाओ मे गोलाकार तारासमुह हो सकते है लेकिन जरूरी नही है। ऐण्ड्रोमीडा आकाशगंगा (M31) मे ऐसे हजारो तारासमुह है। जबकि वामन आकाशगंगा धनु(Sagittarius) मे एक भी गोलाकार तारासमुह नही है।

गोलाकार तारासमुह M80

नाम के अनुसार गोलाकार तारासमुह एक गेंद की तरह गोल होते है जबकि खुले तारासमुह मातृ निहारिका के आकार मे ही होते है। गोलाकार तारासमुह मे हजारो ,लाखो तारे हो सकते है।

गोलाकार तारासमुह ब्रम्हाण्ड निर्माण के समय बने सबसे पहले पिण्ड मे से एक है और ये आज अरबो वर्ष बाद भी है। हमारी आकाश गंगा के गोलाकार तारासमुह की आयु कम से कम ११.३ अरब वर्ष है। इससे हमे ब्रम्हांड की आयु ज्ञात करने मे भी सहायता मिलती है। ब्रम्हांड की आयु किसी तारे की आयु से कम नही हो सकती ।

अधिकतर गोलाकार तारासमुह तारो से बनी एक विशालकाय गेंद के आकार मे है, लेकिन इनके आकार मे अंतर है। यदि हमारा सुर्य कीसी गोलाकार तारासमुह का भाग होता तब रात कभी नही होती !

महाकाय तारा पिसमीस २४-१

एक तारा कितना विशाल हो सकता है ?
खुले तारासमुह पिसमीस २४ मे एक तारे के बारे मे अनुमान है कि वह सूर्य से २०० गुना बडा हो सकता है जो कि एक रिकार्ड है। यह अनुमान उसकी पृथ्वी से दूरी, चमक और मानक सौर माडलो पर आधारीत है।

महाकाय तारा पिसमीस २४-१

चित्र मे यह तारा गैस के बादल के दांये सबसे चमकदार पिण्ड के रूप मे दिखायी दे रहा है। हब्बल दूरबीन से ली गयी ताजा तस्वीरो से पता चलता है कि इस तारे की चमक(प्रकाश दिप्ती) के पिछे कम से कम तीन तारो का योगदान है। इसके बावजूद ये तारे कम से कम सूर्य से १०० गुना बडे होंगे, फिर भी यह एक रिकार्ड है।
अपने विशालकाय द्रव्यमान की वजह से ये तारे अपनी मृत्यु के पश्च्चात श्याम वीवर को जन्म देंगे। लेकिन यह प्रक्रिया कुछ अरब वर्ष मे बाद ही होगी।

चित्र मे बाये उत्सर्जन निहारीका NGC 6357 दिखायी दे रही है जिसमे अनेको तारो का जन्म हो रहा है। किन्ही अज्ञात कारणो से इस निहारीका मे निर्मीत तारे महाकाय है, इसमे निर्मीत तारो का द्रव्यमान औसतन सूर्य से १० गुना ज्यादा है। ये निहारीका हमसे ८००० प्रकाशवर्ष दूर है और ४०० प्रकाशवर्ष चौडी है। इस निहारीका मे गैस, श्याम धूल और नये तारो का जमावडा है।इस निहारीका का लाल रंग इसमे पाये जाने वाले आवेशीत हायड्रोजन (ionized)परमाणुओ के कारण है।

आसमान मे सात बहने : कृत्तिका नक्षत्र